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Madhya Pradesh Assembly by-elections by-elections will also decide the future of the government

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Updated: | Tue, 29 Sep 2020 10:08 PM (IST)

Madhya Pradesh Assembly by-elections: भोपाल (नईदुनिया स्टेट ब्यूरो)। मप्र विधानसभा की 28 सीटों के लिए होने वाला उपचुनाव पूरे देश के लिए यादगार बनेगा। चुनावी इतिहास में मप्र के लिए यह पहला मौका है जब इतनी ज्यादा सीटों पर एक साथ उपचुनाव हो रहा है। इसके नतीजे सरकार टिकाने और बिगाड़ने का भी सबब बनेंगे। इसमें शिवराज सरकार के 14 मंत्रियों का भविष्य दांव पर लगा है।

जो चुनाव हारेगा, उसे मंत्री पद से हाथ धोना पड़ेगा। होली के पहले से ही मध्य प्रदेश की राजनीति में आपरेशन कमल की नींव पड़ी तो कांग्रेस के रंग में भंग पड़ गया। होली समाप्त होते-होते कमल नाथ की सरकार चली गई।

पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की अगुवाई में छह मंत्रियों समेत 22 विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता और कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा का झंडा उठा लिया। यही नेता कमल नाथ की सरकार गिराने और शिवराज के सिर पर चौथी बार सेहरा बांधने के सारथी बने। इसके पहले जौरा क्षेत्र के कांग्रेस विधायक बनवारी लाल शर्मा और आगर के भाजपा विधायक मनोहर ऊंटवाल के निधन से दो सीटें रिक्त थीं।

शिवराज सरकार बनने के बाद मलहरा क्षेत्र के विधायक प्रद्युम्न लोधी, मांधाता के नारायण पटेल और नेपानगर की विधायक सुमित्रा देवी कास्डेकर कांग्रेस और विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गईं। इसके बाद ब्यावरा के कांग्रेस विधायक गोवर्धन दांगी का आकस्मिक निधन हो गया। इस तरह 28 सीटों पर उपचुनाव की जरूरत आ पड़ी। कांग्रेस को सत्ता में वापसी के लिए 21 सीटों पर जीत जरूरी शिवराज सरकार को अपने स्थायित्व के लिए इस चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करना है।

दूसरी तरफ कमल नाथ सत्ता में वापस लौटने का दावा कर रहे हैं। इस लड़ाई में अपनी सरकार को टिकाए रखने के लिए भाजपा को केवल नौ सीटों पर हीजीत की जरूरत है। निर्दलीय और सपा-बसपा के विधायकों का रुख साफ है। जिसके हाथ में सत्ता रहेगी, वे उसी के साथ रहेंगे, लेकिन कांग्रेस को अपनी खोई सरकार वापस पाने के लिए कम से कम 21 सीटों पर जीत जरूरी होगी। तब वह सपा-बसपा व अन्य के समर्थन से सरकार फिर बना सकती है।

इन मंत्रियों की किस्मत का होगा फैसला

शिवराज सरकार के 14 मंत्री चुनाव मैदान में अपनी किस्मत आजमाएंगे। इनमें तुलसीराम सिलावट- सांवेर, गोविंद सिंह राजपूत- सुरखी, डॉ. प्रभुराम चौधरी- सांची, प्रद्युम्न सिंह तोमर- ग्वालियर, महेंद्र सिंह सिसौदिया- बमोरी, बिसाहूलाल सिंह- अनूपपुर, एदल सिंह कंषाना- सुमावली, हरदीप सिंह डंग- सुवासरा, राजवर्द्धन सिंह दत्तीगांव- बदनावर, इमरती देवी- डबरा, ओपीएस भदौरिया- मेहगांव, गिर्राज डंडौतिया- दिमनी, बृजेंद्र सिंह यादव- मुंगावली और सुरेश धाकड़- पोहरी विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के टिकट पर अपनी किस्मत आजमाएंगे। 2018 में इन सभी ने कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीता था।

आठ लोगों ने विधायकी गंवाई और मंत्री पद भी नहीं मिला

बताया जाता है कि सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने वाले सभी विधायकों को यह उम्मीद थी कि उन्हें मंत्री बनाया जाएगा। कांग्रेस छोड़कर जाने वाले आठ नेता ऐसे रहे जिन्होंने विधायकी भी गंवा दी और मंत्री पद भी नहीं मिला। इनमें अंबाह से जीते कमलेश जाटव, अशोक नगर से जजपाल सिंह जज्जी, करैरा से जसवंत जाटव, ग्वालियर पूर्व से मुन्नालाल गोयल, गोहद से रणवीर जाटव, भांडेर से रक्षा सरौनिया, मुरैना से रघुराज सिंह कंषाना और हाटपीपल्या से मनोज चौधरी हैं। इनमें रणवीर जाटव को छोड़कर बाकी सभी पहली बार विधानसभा चुनाव जीते थे। अब फिर से चुनाव मैदान में जाने से सर्वाधिक चुनौती इन्हीं आठों को है। अगर चुनाव हार गए तो न खुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम, वाली कहावत चरितार्थ हो जाएगी।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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